What is Second-Hand Stress: सेकंड हैंड स्ट्रेस क्या है? जब दूसरों की परेशानी बन जाए आपकी मानसिक चिंता
arvind sahu
Saturday, July 11, 2026

What is Second-Hand Stress: आज सभी के पास किसी न किसी वजह से चिंता की वाजिब वजह मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद कई लोग अच्छी लाइफस्टाइल, योग और मेडिटेशन के जरिए खुद को तरोताजा और मानसिक रूप से बेहतर रखने की कोशिश करते हैं। वहीं, आपने देखा होगा कि आसपास कई ऐसे लोग भी मिल जाते हैं, जो किसी न किसी बात को लेकर हमेशा चिंता में डूबे रहते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि वे अपनी परेशानियां दूसरों के साथ साझा करते-करते उन्हें भी उसी चिंताजनक माहौल का हिस्सा बना देते हैं। यानी जब कोई व्यक्ति अपनी समस्याओं से ज्यादा दूसरों की परेशानियों और भावनाओं को अपने ऊपर लेने लगता है और उसी वजह से खुद भी तनाव महसूस करने लगता है, तो इस स्थिति को 'सेकंड हैंड स्ट्रेस' (Second-Hand Stress) कहा जाता है।
सेकंड हैंड स्ट्रेस को उदाहरण से समझे
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, किसी डिजिटल मार्केटिंग कंपनी में दो लोग साथ काम करते हैं। उनमें से एक कर्मचारी अपने करियर को लेकर हमेशा चिंता में रहता है। वह अक्सर अपने सहकर्मी से नौकरी की असुरक्षा, भविष्य और बेहतर अवसर न मिलने की बातें साझा करता रहता है। दूसरी ओर, उसका सहकर्मी अपनी नौकरी से पूरी तरह संतुष्ट और मानसिक रूप से तनावमुक्त है। लेकिन रोज-रोज अपने साथी की चिंता सुनते-सुनते वह भी उसके लिए नई नौकरी तलाशने की कोशिश करने लगता है। जब तमाम प्रयासों के बावजूद उसे कोई बेहतर अवसर नहीं मिल पाता, तो वह खुद भी परेशान और निराश रहने लगता है। यानी जिस व्यक्ति के पास शुरुआत में कोई तनाव नहीं था, वह भी दूसरे की चिंता को अपने ऊपर लेकर मानसिक दबाव महसूस करने लगता है। यही स्थिति 'सेकंड हैंड स्ट्रेस' (Second-Hand Stress) कहलाती है। ऐसे उदाहरण हमारे आसपास रोज देखने को मिल जाते हैं, जहां लोग अपनी समस्याओं से कम और दूसरों के दुख-दर्द को लेकर ज्यादा तनाव में रहने लगते हैं।
किन लोगों को होता है सेकंड हैंड स्ट्रेस?
सेकंड हैंड स्ट्रेस की चपेट में सबसे अधिक वे लोग आते हैं, जो स्वभाव से बेहद संवेदनशील (Sensitive) और सहानुभूति रखने वाले (Empathetic) होते हैं। ऐसे लोग दूसरों के दुख-दर्द और भावनाओं को आसानी से अपने ऊपर ले लेते हैं। इसके अलावा डॉक्टर, नर्स, मनोवैज्ञानिक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पुलिसकर्मी, पत्रकार, कॉर्पोरेट मैनेजर और ऐसे कर्मचारी, जिन्हें रोजाना लोगों की समस्याएं सुननी पड़ती हैं, उनमें भी सेकंड हैंड स्ट्रेस का खतरा अधिक रहता है। परिवार में भी कई बार माता-पिता, जीवनसाथी या करीबी दोस्त अपने प्रियजनों की परेशानियों को लेकर इतने अधिक चिंतित हो जाते हैं कि वे स्वयं मानसिक तनाव का शिकार बनने लगते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ दूसरों की मदद करने के साथ-साथ अपनी मानसिक सीमाएं (Emotional Boundaries) तय करने की भी सलाह देते हैं, ताकि उनकी परेशानियां आपकी मानसिक सेहत पर नकारात्मक असर न डाल सकें।
कैसे इस स्थिति से बचे?
सेकंड हैंड स्ट्रेस से बचने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन उसकी हर समस्या को अपनी समस्या बना लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए दूसरों की बातें सहानुभूति के साथ सुनें, लेकिन उन्हें अपने मन पर हावी न होने दें। अपनी भावनात्मक सीमाएं (Emotional Boundaries) तय करें और यह स्वीकार करें कि हर समस्या का समाधान आपके हाथ में नहीं होता। तनाव महसूस होने पर नियमित व्यायाम, योग, ध्यान और पर्याप्त नींद को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। यदि किसी की परेशानी लगातार आपको मानसिक रूप से प्रभावित कर रही है, तो कुछ समय के लिए उससे भावनात्मक दूरी बनाना भी जरूरी हो सकता है। वहीं, यदि यह तनाव लंबे समय तक बना रहे और आपके कामकाज या दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर से सलाह लेना बेहतर विकल्प हो सकता है।