Supreme Court News: रेप की कोशिश पर पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी से सुप्रीम कोर्ट असहमत, जताई कड़ी नाराजगी
arvind sahu
Wednesday, July 15, 2026

Supreme Court News: यौन अपराध से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को और मजबूत करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति की तैयार की गई रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ देश के सभी हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइटों पर अपलोड करने का आदेश दिया है।
यह रिपोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च, 2025 के उस विवादित आदेश के बाद स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही के दौरान तैयार की गई थी। उस आदेश में कहा गया था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना, अपने आप में रेप के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता। इसी टिप्पणी को लेकर जमकर विवाद हुआ था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़े पहलुओं की समीक्षा कराई।
पटना हाइकोर्ट का फैसले में भी विवाद
यह पूरा विवाद 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद शुरू हुआ, जिसमें अदालत ने एक मामले में कहा कि पीड़िता की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसके स्तनों को पकड़ना, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि अदालत ने आरोपी के कृत्य को महिला की लज्जा भंग करने का गंभीर अपराध माना, लेकिन दुष्कर्म के प्रयास की धारा लागू नहीं मानी। फैसले के सार्वजनिक होते ही इस पर तीखी बहस छिड़ गई और कई कानूनी विशेषज्ञों के साथ महिला अधिकार संगठनों ने भी न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सवाल उठाए। यही मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और संवेदनशीलता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।
महिला वकील ने सवाल उठाया
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि यह केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि समय-समय पर देश की विभिन्न अदालतों से भी ऐसे फैसले सामने आते रहे हैं, जो यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करते हैं। इस दौरान उन्होंने हाल ही में आए पटना हाईकोर्ट के विवादित आदेश का भी उल्लेख किया। इस पर जस्टिस वी. मोहन ने पूछा कि क्या पटना हाईकोर्ट ने उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का संज्ञान लिया था, जिसमें जजों को ऐसे मामलों में अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी गई थी। वहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पटना हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायाधीशों की भी जिम्मेदारी है कि वे संबंधित मामलों पर आवश्यक शोध करें। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा, "स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।"
पटना हाईकोर्ट का विवादित प्रकरण
पटना हाईकोर्ट का विवादित प्रकरण बिहार के बांका जिले में वर्ष 2008 में एक महिला के साथ हुई एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक फोटो स्टूडियो में आरोपी ने युवती को अंदर बंद कर उसकी सलवार उतारने की कोशिश की, अपनी पैंट उतारी और उसके स्तनों को पकड़ा। निचली अदालत ने इसे दुष्कर्म के प्रयास का मामला मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया था। लेकिन 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट ने यह फैसला पलट दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से दुष्कर्म के प्रयास के आवश्यक तत्व सिद्ध नहीं होते, क्योंकि प्रवेश (Penetration) या उससे जुड़े स्पष्ट कृत्य का प्रमाण नहीं मिला। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी का कृत्य महिला की लज्जा भंग करने की श्रेणी में आता है और धारा 354 के तहत दंडनीय है। फैसले के सार्वजनिक होते ही देशभर में विवाद छिड़ गया। महिला अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस पर सवाल उठाए, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में भी इस आदेश का जिक्र हुआ। शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता की आवश्यकता पर जोर देते हुए ऐसे फैसलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।